रेडियो की मधुर यादों को शब्दों में पिरोती कविता ‘रेडियो’ – सुषमा प्रेम पटेल की स्नेहिल प्रस्तुति

रायपुर। बदलते दौर में जहां डिजिटल माध्यमों ने मनोरंजन के कई नए रास्ते खोल दिए हैं, वहीं रेडियो की पुरानी यादें आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखती हैं। इसी भावनात्मक जुड़ाव को शब्दों में सजाते हुए रायपुर की साहित्यकार सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी नई काव्य रचना “रेडियो” के माध्यम से बीते समय की मधुर स्मृतियों को जीवंत कर दिया है।

“सुषमा के स्नेहिल सृजन”
रेडियो
बात रेडियो की चली, मन में उठे हिलोर।
रामायण की पंक्तियाँ, सुनते थे शुभ भोर।।
गीत-गजल के संग में, मधुरिम बजते राग।
साधन नित आनंद का, लेकर घूमें बाग।।
खबरों के संसार से, विविध मिले नित ज्ञान।
हाथ रहे जब रेडियो, मिलता था सम्मान।।
सुनते जब संदेश हम, सैनिक के परिवार।
रो उठते थे सुन सभी, उनके मृदु उद्गार।।
विविध भारती गीत है, मन में भरे उमंग।
बजता धुन जब रेडियो, तन-मन पुलकित अंग।।
सुनते थे हम खेल को, होता सदा प्रसार।
जयकारा करते सभी, और करें आभार।।
’सुषमा’ बजते गीत जब, मीठे सुर बरसात।
मन मंदिर में गूँजते, सरगम धुन शुभ गात।
_सुषमा प्रेम पटेल
कविता में रामायण की पावन चौपाइयों से लेकर विविध भारती के गीतों, खेल प्रसारण और सैनिकों के संदेशों तक, रेडियो के स्वर्णिम दौर की झलक देखने को मिलती है। सुषमा जी ने सरल और भावपूर्ण शब्दों के जरिए बताया है कि किस तरह रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान, संवेदना और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी रहा है।
काव्य पंक्तियों में रेडियो से जुड़े पारिवारिक माहौल, गीत-ग़ज़लों की मधुर धुन और सुबह की आध्यात्मिक शुरुआत का उल्लेख पाठकों को पुराने दिनों की याद दिलाता है। विशेष रूप से सैनिक परिवारों के संदेशों का जिक्र कविता को संवेदनात्मक ऊंचाई देता है, जिससे श्रोताओं के मन में देशभक्ति और अपनत्व की भावना जागृत होती है।
साहित्य प्रेमियों के अनुसार, “सुषमा के स्नेहिल सृजन” श्रृंखला की यह रचना आज के युवाओं को रेडियो की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का सुंदर प्रयास है।
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