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बस्तर में प्रवासी पक्षियों का बसेरा : काकड़ीघाट बना ‘नेचर का ब्रेक-जर्नी प्वाइंट’

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित काकड़ीघाट और आसपास का क्षेत्र इन दिनों प्रवासी पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। हाल ही में किए गए एक शोध में सामने आया है कि मारकंडी और बोरिया नदी के संगम क्षेत्र सहित घने जंगल और जलस्रोत प्रवासी पक्षियों के लिए “ब्रेक-जर्नी” यानी अस्थायी विश्राम स्थल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

शोध के अनुसार, सर्दियों के मौसम में दूर-दराज देशों से आने वाले पक्षी अनुकूल जलवायु, भोजन और सुरक्षित वातावरण की तलाश में यहां रुकते हैं। काकड़ीघाट, चपका और घोरसाड़ क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता इन पक्षियों को विशेष रूप से आकर्षित करती है। हालांकि, यह क्षेत्र अभी तक किसी आधिकारिक “पक्षी अभयारण्य” के रूप में घोषित नहीं है, फिर भी यहां बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति दर्ज की गई है।

  • शोध में क्या सामने आया?

शोधकर्ताओं ने पक्षियों के प्रवास मार्ग, उनके ठहरने के समय और संभावित खतरों का विश्लेषण किया। साथ ही विभिन्न प्रजातियों की पहचान कर यह समझने का प्रयास किया गया कि किन परिस्थितियों में ये पक्षी इस क्षेत्र को चुनते हैं।

  • बढ़ते खतरे भी चिंता का विषय

शोध में यह भी स्पष्ट हुआ कि इन प्राकृतिक आवासों पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और पर्यावरणीय असंतुलन प्रवासी पक्षियों के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।

  • संरक्षण की जरूरत पर जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, रासायनिक पदार्थों के उपयोग पर नियंत्रण और प्राकृतिक जलस्रोतों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। इससे न केवल पक्षियों को सुरक्षित ठिकाना मिलेगा, बल्कि बस्तर की पारिस्थितिकी भी मजबूत होगी।

  • स्थानीय लोगों की अहम भूमिका

इस शोध को तैयार करने में स्थानीय ग्रामीणों का सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा। उनके अनुसार, हर साल सर्दियों में पक्षियों की बढ़ती संख्या यह संकेत देती है कि बस्तर का यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद समृद्ध और महत्वपूर्ण है।

काकड़ीघाट और आसपास का इलाका आने वाले समय में छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख “बर्ड वॉचिंग स्पॉट” बन सकता है – बशर्ते समय रहते इसके संरक्षण पर ठोस कदम उठाए जाएं।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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