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161 साल पहले बीजापुर में आदिवासियों ने जंगल बचाने फूंका था बिगुल, “एक साल वृक्ष के पीछे, एक व्यक्ति का सिर” के नारे से हुई थी “कोई विद्रोह” की मुनादी

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पवन दुर्गम, बीजापुर। 09 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के रूप में पहचाना जाता है। इस दिन संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने आदिवासियों के भले के लिए एक कार्यदल गठित किया था जिसकी बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई थी। उसी के बाद से (UNO) ने अपने सदस्य देशों को प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाने की घोषणा की। ब्रिटिसकालीन रियासत के दौरान आज से 161 साल पहले 1859 को बीजापुर जिले में अंग्रेजो की सरपरस्ती में सागौन के जंगलों को काटकर हैदरबाद के निजाम द्वारा तस्करी को रोकने आदिवासियों ने आंदोलन छेड़ा था जिसको “कोई विद्रोह” के नाम से जाना जाता है। फोतकेल के जमींदार नागुल दोरला ने इस आंदोलन का बिगुल फूंका था। यह विद्रोह बीजापुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ का एक अलग आंदोलन था जिसमे साल वृक्ष के जंगलों को तस्करों से बचाने के लिए लड़ा गया था। आंदोलन का मूल नारा ” एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर” दिया गया था।

जानिए कोई विद्रोह को विस्तार से…कोई विद्रोह (1859 ई.) वन रक्षा हेतु आन्दोलन

बस्तर की दोरली की उपभाषा (बोली) में कोई का अर्थ होता है वनों और पहाड़ों में रहने वाली आदिवासी प्रजा। प्राचीन समय में वन बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण संसाधन रहा है। दक्षिण बस्तर अंग्रेजों की शोषण व गलत वन नीति से आदिवासी काफी असन्तुष्ट थे। फोतकेल के जमींदार नागुल दोरला ने भोपालपट्टनम् के जमींदार राम भोई और भेजी के जमींदार जुग्गाराजू को अपने पक्ष में कर अंग्रेजों द्वारा साल वृक्षों के काटे जाने के खिलाफ 1859 ई. में विद्रोह कर दिया। विद्रोही जमींदारों और आदिवासी जनता ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि अब बस्तर के एक भी साल वृक्ष को काटने नहीं दिया जाएगा। अपने इस निर्णय की सूचना उन्होंने अंग्रेजों एवं हैदराबाद के ब्रिटिश ठेकेदारों को दी। ब्रिटिश सरकार ने नागुल दोरला और उनके समर्थकों के निर्णय को अपनी प्रभुसत्ता को चुनौती मानकर वृक्षों की कटाई करने वाले मजदूरों की रक्षा करने के लिए बन्दूकधारी सिपाही भेजे। दक्षिण बस्तर के आदिवासियों को जब यह खबर लगी, तो उन्होंने जलती हुई मशालों को लेकर अंग्रेजों के लकड़ी के टालों को जला दिया और आरा चलाने वालों का सिर काट डाला। आन्दोलनकारियों ने एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर’ का नारा दिया। इस जनआन्दोलन से हैदराबाद का निजाम और अंग्रेज घबरा उठे। बाध्य होकर निजाम और अंग्रेजों ने नागुल दोरला और उसके साथियों के साथ समझौता किया। कैप्टन सी. ग्लासफोर्ड जबकि सिरोंचा का डिप्टी कमिश्नर था, ने विद्रोहियों की भयानकरता को देखते हुए अपनी हार मान ली और बस्तर में उसने लकड़ी ठेकेदारों की प्रथा को समाप्त कर दिया।

बस्तर के वनों को समय से पूर्व कटने से बचाने का यह विद्रोह बस्तर का ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ का अपने किस्म का अनोखा विद्रोह था। इस विद्रोह के पीछे आदिवासियों की आटविक मानसिकता का परिचय मिलता है। सालद्वीप के मूल प्रजाति साल की रक्षा के लिए सभ्य समाज से दूर कहे जाने वाले आदिवासियों ने जो अनोखा संघर्ष किया है, वह उनके पर्यावरण जागृति को दर्शाता है। इस तरह की जागृति और चौकन्नापन आज की पीढ़ी में दिखाई नहीं देता। यह विद्रोह आज के शिक्षित समाज के लिए एक प्रेरणा है। इस विद्रोह में जनजातियों की वैचारिक दृढ़ता के दर्शन होते हैं। कोई विद्रोह बस्तर का पहला विद्रोह था, जिसमें अंग्रेजों ने अपनी हार मानी और विद्रोहियों के साथ समझौता किया था।

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