
श्रध्देय अटल बिहारी वाजपेयी जी की 101वीं जयंती पर विशेष
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा… जब राजनीति कविता बन गई

भारत की राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो सत्ता से बड़े और समय से परे होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी उन्हीं विरले नेताओं में से एक थे। आज उनकी जन्म जयंती पर देश उन्हें केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवि, दूरदर्शी राजनेता और मानवीय मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में स्मरण कर रहा है।
ऐसे व्यक्तित्व, जिनके जाने के बाद भी शब्दों में सन्नाटा नहीं आता, बल्कि स्मृतियों में उजाला भर जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही व्यक्तित्व थे – जो पद से नहीं, अपने संस्कारों से पहचाने जाते थे।
आज उनकी जयंती पर देश उन्हें याद करता है तो आँखें नम हो जाती हैं.. क्योंकि अटल जी सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं थे, वे हर उस भारतीय की भावना थे, जो राजनीति में भी इंसानियत देखना चाहता था।
अटल जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में भी शालीनता, संवाद और सहमति संभव है। वे विचारों में दृढ़ थे, पर व्यवहार में विनम्र। विरोधियों के प्रति भी सम्मान उनकी राजनीति का स्वभाव था। संसद में जब वे बोलते थे, तो शब्द शोर नहीं मचाते थे – वे संवेदना जगाते थे।
प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी ने भारत को आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का नया अर्थ दिया। पोखरण के परमाणु परीक्षणों ने भारत को वैश्विक मंच पर सशक्त किया, वहीं खुद को ‘एक साधारण कवि’ कहने वाले अटल जी ने शांति और संवाद की राह भी कभी नहीं छोड़ी। लाहौर बस यात्रा हो या पड़ोसी देशों से संवाद – उनका संदेश स्पष्ट था: शक्ति के साथ संयम, और नीति के साथ मानवीय दृष्टि।
अटल जी के लिए राष्ट्र निर्माण केवल सड़कों, पुलों और परियोजनाओं तक सीमित नहीं था। ग्रामीण भारत, संचार क्रांति, स्वर्णिम चतुर्भुज, और सुशासन – ये सब उनके विकास दर्शन के स्तंभ रहे। लेकिन इन सबसे ऊपर, उनका विश्वास था कि लोकतंत्र का बल लोक की गरिमा में है।
कवि अटल की पंक्तियाँ आज भी मन को छूती हैं – “हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा…”
यह केवल कविता नहीं, बल्कि उनका जीवन मंत्र था। कठिन से कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी – न व्यक्तिगत आक्षेपों से विचलित हुए, न ही सिद्धांतों से डिगे।
आज, जब सार्वजनिक जीवन में कटुता और त्वरित प्रतिक्रियाएँ बढ़ रही हैं, अटल जी की विरासत हमें संयम, संवाद और समावेशन की याद दिलाती है। उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है—कि क्या हम राजनीति और समाज में उस मर्यादा को जीवित रख पा रहे हैं, जिसे अटल जी ने जिया।
- राजनीति में शुचिता का पर्याय
आज जब राजनीति में शब्दों की मर्यादा टूटती दिखती है, तब अटल जी का स्मरण और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि बिना शोर किए भी नेतृत्व किया जा सकता है, और बिना अपमान किए भी विरोध संभव है। संसद में उनके भाषण केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं होते थे, बल्कि लोकतंत्र का शास्त्र होते थे।
विपक्ष भी उनकी बात ध्यान से सुनता था, क्योंकि उनके शब्दों में तर्क के साथ करुणा होती थी। वे बहस जीतने नहीं, बल्कि देश को समझाने के लिए बोलते थे।
- सशक्त भारत का आत्मविश्वास
प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी ने भारत को वैश्विक मंच पर एक नया आत्मविश्वास दिया। पोखरण परमाणु परीक्षणों ने भारत की सामरिक क्षमता को स्थापित किया, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत शक्ति का उपयोग शांति के लिए करता है, भय के लिए नहीं।
उनका सुशासन का विचार केवल फाइलों तक सीमित नहीं था – वह सड़कों में, संचार में, गांवों में और आम आदमी की उम्मीदों में दिखता था। स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी परियोजनाएँ केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं थीं, बल्कि राष्ट्र को जोड़ने की सोच थी।
- अंत्योदय का भाव, अंतिम व्यक्ति तक विकास
अटल जी का विकास दर्शन महानगरों तक सीमित नहीं था। वे उस भारत को देख रहे थे, जो गांवों, आदिवासी अंचलों और दूरस्थ क्षेत्रों में बसता है। अंत्योदय – अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान – का विचार उनके शासन की आत्मा था।
आज बस्तर जैसे अंचलों में जब विकास, सड़क, शिक्षा और संवाद की बात होती है, तो अटल जी की सोच स्वाभाविक रूप से स्मरण हो आती है – कि विकास वही है, जो विश्वास पैदा करे।
- कवि, जो कभी प्रधानमंत्री हुआ
अटल जी की कविता उनके राजनीतिक जीवन से अलग नहीं थी। वह उनकी आत्मा की आवाज़ थी –
मैं किसी से बैर नहीं रखता,
फिर भी मैं पराजित नहीं हूँ…
यह पंक्तियाँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि उनके जीवन का दर्शन थीं। हारना, सत्ता से बाहर होना, आलोचना – कुछ भी उन्हें विचलित नहीं कर सका। वे जानते थे कि राजनीति अस्थायी है, मूल्य स्थायी।
Cgtimes.in की ओर से, भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी को नमन। 🙏🏻💐
आप शब्दों में कविता और कर्मों में राष्ट्र थे –
आप सत्ता नहीं, संस्कार थे।
आप थे, इसलिए राजनीति भी कभी-कभी कविता बन सकी..
_दिनेश के.जी., संपादक सीजीटाइम्स डॉट इन
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