“सुषमा के स्नेहिल सृजन” में भक्ति की अनुपम धारा, ‘दुर्गार्चना’ से भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

रायपुर। आध्यात्मिक भावों से ओतप्रोत “सुषमा के स्नेहिल सृजन” श्रृंखला में कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल द्वारा प्रस्तुत छंद-रूपघनाक्षरी काव्य “दुर्गार्चना” इन दिनों साहित्य और भक्ति प्रेमियों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस रचना में माँ दुर्गा के विविध स्वरूपों की आराधना, श्रद्धा और समर्पण का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
“सुषमा के स्नेहिल सृजन”
छंद-रूपघनाक्षरी
“दुर्गार्चना”
आरोग्य संतुष्टि देना कष्ट सभी हर लेना,
भवानी माँ जगदम्बा
प्रार्थना करो स्वीकार।
‘सुषमा’ समृद्ध सृष्टि आशीष की होवे वृष्टि,
देवी माता नवदुर्गा
सेवारत है संसार।
जगत कल्याणी मैया पार करो मेरी नैया,
झोली मेरी भर दो माँ
आई तेरे दरबार।
अखंड ज्योति जले सद्भावना सुदीप फले,
सनातनी जग बने
प्रेम भरा व्यवहार।
आराधना आदिशक्ति जानूँ नहीं तेरी भक्ति,
अबोध अज्ञानी हूँ माँ
कैसे करूँ मंत्रोच्चार?
पीर हरो ज्वाला देवी विनती हे! शिवशक्ति,
आँचल फैलाने आई
मैया आज तेरे द्वार।
वैष्णोदेवी बूढ़ीमाई कष्ट काटो समलाई,
चन्द्रहासिनी हे! माते
माँ की महिमा अपार।
‘सुषमा’ को शक्ति दो माँ होवे मत अत्याचार,
कर पाऊँ साहस से
बलि पूजा प्रतिकार।
_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल
कविता की हर पंक्ति में माँ भगवती से आरोग्य, संतुष्टि और कष्टों के निवारण की प्रार्थना की गई है। कवयित्री ने अत्यंत सरल लेकिन भावपूर्ण शब्दों में जगदम्बा, नवदुर्गा, वैष्णो देवी, चन्द्रहासिनी जैसी शक्तियों का स्मरण कर भक्ति रस की सरिता प्रवाहित की है।
रचना का विशेष आकर्षण इसकी विनम्रता और आत्मसमर्पण है, जहाँ कवयित्री स्वयं को “अबोध अज्ञानी” कहकर माँ से मार्गदर्शन और शक्ति की याचना करती हैं। साथ ही, समाज में सद्भाव, प्रेम और सनातन मूल्यों के प्रसार की कामना भी इस काव्य के माध्यम से व्यक्त की गई है।
अंतिम पंक्तियों में कवयित्री ने समाज में अन्याय के खिलाफ खड़े होने की शक्ति माँगी है, जो इस रचना को केवल भक्ति तक सीमित न रखकर सामाजिक चेतना से भी जोड़ती है।
यह काव्य न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करता है, बल्कि समाज में सकारात्मकता, साहस और संस्कारों के प्रसार का संदेश भी देता है।
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