छत्तीसगढ़रायपुरसाहित्य सृजन

शहनाइयों संग गूंजा राम-जानकी विवाह का दिव्य उल्लास, कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की कलम से जीवंत हुआ राम-सीता विवाह प्रसंग

राम-जानकी विवाह पर सजी भावनाओं की अनुपम काव्यधारा

घनाक्षरी छंद में सजी राम-जानकी विवाह की मनोहारी काव्य प्रस्तुति

शब्दों में झलका राम-जानकी विवाह का मंगलमय वैभव

रायपुर। धार्मिक आस्था, संस्कृति और पारिवारिक भावनाओं से ओतप्रोत कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की नवीन काव्य रचना “राम जानकी विवाह” इन दिनों साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष सराहना बटोर रही है। छंद-मनहरण घनाक्षरी शैली में रचित इस काव्य में माता सीता और प्रभु श्रीराम के पावन विवाह प्रसंग को अत्यंत भावपूर्ण एवं जीवंत शब्दों में चित्रित किया गया है।

“सुषमा के स्नेहिल सृजन”

छंद-मनहरण घनाक्षरी

राम-जानकी विवाह

मंगल कलश द्वार, जनक दुलारी चार,
विवाह की घड़ी शुभ,
बजे शहनाइयाँ।

शंख घंट घड़ियाल, सजे-धजे द्वारपाल,
महल प्राँगण हर्ष,
चहुँओर छाइयाँ।

राघव जानकी नाथ, लखन उर्मिला साथ,
भरत माण्डवी बंध,
मिले हैं बधाइयाँ।

शत्रुघ्न जी श्रुतिकीर्ति, बंधन पावन प्रीति,
हर्षित माताएँ तीनों,
ले रहीं बलाइयाँ। (१)

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आभूषण स्वर्ण ज्योति, कर्णफूल माँगमोती,
‘सुषमा’ सुंदर दृश्य,
तोरण सजाइयाँ।

पायल कंगन चूड़ी, करधनी बाजुबंध,
सखियाँ सजाने आईं,
सजतीं दुलारियाँ।

ब्याह कर लाई गईं, वेला है आनंदमयी,
वामांगी बंधन प्रीत,
बनीं परछाइयाँ।

हृदय आनंद भरे, सज रहे स्वप्न नये,
महल गूंजेंगे अब,
जल्द किलकारियाँ।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल 

कविता में शहनाइयों की मंगल ध्वनि, सजे हुए द्वार, हर्षोल्लास से भरा राजमहल, माताओं का स्नेह, सखियों का श्रृंगार और चारों भाइयों के विवाह प्रसंग का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। हर पंक्ति भारतीय संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और वैवाहिक संस्कारों की गरिमा को सजीव करती है।

कवयित्री ने अपनी रचना में न केवल राम-सीता विवाह की दिव्यता को उकेरा है, बल्कि भारतीय नारी के प्रेम, समर्पण और परिवार की मधुर अनुभूतियों को भी शब्दों में सजाया है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ आने वाले नए जीवन, खुशियों और किलकारियों की मधुर कल्पना से पाठकों के मन को भावविभोर कर देती हैं।
साहित्य जगत में इस रचना को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की सुंदर अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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