छत्तीसगढ़साहित्य सृजन

छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में रचा-बसा ‘हरेली तिहार’ : सुषमा प्रेम पटेल की कविता ने भावों की डोंगी में बिठाकर कराया लोकपर्व का आनंद

जय जोहार – सुघ्घर बिहनिया संग सुसंस्कृत सृजन 

रायपुर। छत्तीसगढ़ी परंपराओं और लोकभावनाओं को शब्दों में पिरोकर अपनी खास पहचान बना चुकीं कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने “हरेली तिहार” पर आधारित मनहरण घनाक्षरी छंद में एक सुंदर और सजीव रचना प्रस्तुत की है। उनकी यह कविता छत्तीसगढ़ की मिट्टी, बोली और संस्कारों की खुशबू समेटे हुए हर पाठक को अपने गांव-गंवई की याद दिला रही है।

”सुषमा के स्नेहिल सृजन”

छंद – मनहरण घनाक्षरी

“हरेली तिहार”

अरसा चौसेला चीला, बैठ खाबो माई पिला,
हरेली तिहार हावे,
सब्बो ल जोहार जी।

खेत खार घूम आबो, लीम पान टोर लाबो,
चढ़बो जी गेड़ी संगी,
सुघ्घर तिहार जी।

हरियर हावे डोली, हाँसी खुशी संगी टोली ,
नगाड़ा बजाबो अउ,
करबो सत्कार जी।

दाई-ददा सेवा करौ, आशीष अचरा धरौ,
लइका दुलार राखो,
’सुषमा’ संसार जी।

सुषमा प्रेम पटेल (रायपुर छ.ग.)
सुघ्घर बिहनिया जय जोहार

कविता की हर पंक्ति में लोकपर्व हरेली की जीवंत झलक मिलती है – अरसा-चीला के स्वाद से लेकर गेड़ी चढ़ने की उमंग और दाई-ददा की सेवा-संस्कार तक। “हरियर हावे डोली, हांसी खुशी संगी टोली” जैसे भाव, पाठकों को पारंपरिक उल्लास की यात्रा पर ले जाते हैं।

सुषमा प्रेम पटेल की यह रचना न सिर्फ साहित्यिक रूप से समृद्ध है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से भी परिपूर्ण है। हरेली तिहार की यह सजीव प्रस्तुति छत्तीसगढ़ी कविता प्रेमियों के लिए एक सुंदर सौगात बनकर उभरी है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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