छत्तीसगढ़साहित्य सृजन

श्रावण की सप्तमी पर कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने रचा ‘मानस के तुलसी’ – संत तुलसीदास के जीवन पर आधारित भावपूर्ण रचना

रायपुर। श्रावण शुक्ल सप्तमी के पावन अवसर पर रायपुर की चर्चित कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी नवीन कविता “मानस के तुलसी” के माध्यम से संत तुलसीदास के जीवन के प्रारंभिक संघर्षों, त्याग और रामभक्ति को अत्यंत सरस व संवेदनशील शब्दों में चित्रित किया है।

“सुषमा के स्नेहिल सृजन”

मानस के तुलसी

श्रावण शुक्ला सप्तमी, राजापुर था गाँव।
जहाँ जन्म तुलसी लिए, पूत पालने पाँव।।

हुलसी माँ भी जन्म दे, छोड़ चली परलोक।
भिक्षा से दिन बीतते, मात बिना अति शोक।।

त्याग पिता ने पुत्र जब, चुनिया धाय महान।
मंदिर में नरहरि मिले, मिली शरण गुरु ज्ञान।।

भार्या कटु उपदेश से, लिए जगत संन्यास।
हृदय हुआ व्याकुल बहुत, चलते बने प्रवास।।

रामचरित मानस रचे, कवियों के सरताज।
जन-जन में उल्लास है, शुभ-शुभ होता काज।।

राम-राम जपते सदा, लिख चौपाई छंद।
दोहा रोला सोरठा, सरस छंद का बंद।।

मानस पावन ग्रंथ से, होता जग कल्याण।
राम नाम की सत्यता, साक्षी वेद पुराण।।

मर्यादा की बात जब, करता संत समाज।
त्याग,तपस्या,धर्म की, उपमा देते आज।।

बैठ घाट चंदन घिसे, माथ सजे रघुवीर।
तुलसी जीवन धन्य हो, कटे पाप सह पीर।।

सीता के प्रिय राम जी, ‘सुषमा’ करती ध्यान।
लिखकर मानस पंक्तियाँ, तुलसी बने महान।।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल, रायपुर, छत्तीसगढ़ 

इस छंदबद्ध कविता में कवयित्री ने बालक तुलसीदास के जन्म, माता हुलसी का वियोग, पिता द्वारा त्यागे जाने की वेदना, चुनिया धाय की ममता, गुरु नरहरि से प्राप्त ज्ञान और जीवन में आए आध्यात्मिक परिवर्तन को सहज भाषा में प्रस्तुत किया है। कविता की पंक्तियाँ तुलसीदास के रामचरितमानस रचने से लेकर उनके संन्यास, भक्ति, त्याग और समाज को दी गई मर्यादा की प्रेरणा तक का सुंदर चित्रण करती हैं।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ “सीता के प्रिय राम जी, ‘सुषमा’ करती ध्यान। लिखकर मानस पंक्तियाँ, तुलसी बने महान।।” तुलसीदास के रामभक्ति भाव को कवयित्री की श्रद्धा से जोड़ती हैं।
श्रावण मास में तुलसीदास जैसे महापुरुषों को समर्पित इस रचना ने पाठकों के मन को छू लिया है। धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मंचों पर यह रचना खूब सराही जा रही है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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