आध्यात्मिकता और काव्य का संगम : “पुरुषार्थ” पर सुषमा का सृजन – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की काव्यात्मक व्याख्या
“सुषमा के स्नेहिल सृजन” में झलका जीवन दर्शन

साहित्य साधना में ‘सुषमा’ का नया पुष्प : पुरुषार्थ की अलंकृत घनाक्षरी
सुषमा के स्नेहिल सृजन” में पुरुषार्थ की अनूठी अभिव्यक्ति
रायपुर। साहित्य साधना की पावन धारा में सतत सक्रिय कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपने नवीन सृजन “पुरुषार्थ” के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चतुर्विध पुरुषार्थ की गहन व्याख्या की है।
उनकी अलंकृत मनहरण घनाक्षरी शैली में रचित यह कविता शास्त्र सम्मत चिंतन, आध्यात्मिकता और जीवन के आदर्श सिद्धांतों का समावेश करती है।
”सुषमा के स्नेहिल सृजन”
छंद-पूर्वाक्षरी अलंकृत मनहरण घनाक्षरी
‘पुरुषार्थ’
धर्म शास्त्र अनुसार, त्रिवर्ग कर्तव्य पूर्ण,
आधार है सर्वश्रेष्ठ,
ईश्वर आभास का।
अर्थ का संचय वही, करते अज्ञानी जन,
अधिक न श्रेष्ठ कभी,
करना प्रयास का।
काम वासना से परे, हृदय आनंद भरे,
‘सुषमा’ उद्देश्य लक्ष्य,
सिद्धांत विश्वास का।
मोक्ष प्राप्ति साधन है, चतुर्विध पुरुषार्थ,
शास्त्र विधि संरचना,
वैकुण्ठ निवास का।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल
कवयित्री ने धर्म को जीवन का सर्वोच्च आधार, अर्थ को केवल आवश्यकता तक सीमित, काम को हृदय के आनंद और मोक्ष को परम लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत कर पाठकों को सनातन जीवन मूल्यों की ओर उन्मुख किया है।
“सुषमा के स्नेहिल सृजन” श्रृंखला की यह रचना साहित्य जगत में चिंतन और प्रेरणा दोनों का संदेश देती है।
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