छत्तीसगढ़साहित्य सृजन

डमरू नाद से गूंजा शिव भाव : कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की भक्ति रचना ने बाँधा श्रोताओं का मन

रायपुर। “सुषमा के स्नेहिल सृजन” श्रृंखला में भक्ति की गहराइयों को छूती एक नई पेशकश – गीत ‘शिवार्चना’ ने शिवभक्तों के हृदय को भावविभोर कर दिया है।

”सुषमा के स्नेहिल सृजन”

विधा-गीत

शिवार्चना

डमरू नाद उठे कैलाशा, शिव-तांडव दिखलाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

सृष्टि मूल के स्रोत तुम्ही हो, देते आप सहारा।
रौद्र रूप दर्शन से थर-थर, काँपे है जग सारा।।
जटाजूट में गंग विराजे, नीलकण्ठ कहलाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

तुंग हिमालय वास सदाशिव, रक्षा सबकी करते।
दीन-दुखी की पीड़ा हरते, खाली झोली भरते।।
सर्प गले में धारण करते, गरलपान कर जाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

’सुषमा’ सुंदर ध्यान करें जो, पायें वही किनारा।
भक्त-हृदय के भाव समझते, देते आप सहारा।।
हर प्राणी के दुख को हरते, भोलेनाथ कहाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

औघड़दानी त्रिपुरारी के, शरणागत जो जाता।
शिव भोले भंडारी से वह, पूर्ण तेज बल पाता।।
आंक-धतूरा-बेलपत्र सह, चंदन तिलक लगाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

डमरू-नाद उठे कैलाशा, शिव-तांडव दिखलाते।
भूतनाथ जब भस्म रमाते, डमरू खूब बजाते।।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल (रायगढ़/रायपुर) छ.ग.

कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल द्वारा रचित यह गीत “डमरू नाद उठे कैलाशा, शिव-तांडव दिखलाते…” की पंक्तियों से शुरू होकर भगवान शिव के विविध स्वरूपों का मार्मिक वर्णन करता है – भूतनाथ, नीलकंठ, औघड़दानी जैसे रूपों की गूंज पूरे गीत में प्रतिध्वनित होती है।

गीत में शिव की महिमा, उनकी करुणा और उनके रौद्र रूप का ऐसा भावप्रवण चित्रण किया गया है कि पाठक और श्रोता सहज ही भक्ति रस में डूब जाता है। भस्म रमाते, डमरू बजाते शिव के दृश्य सजीव हो उठते हैं।

कवयित्री की लेखनी न केवल शिवभक्तों को भावविभोर करती है बल्कि युवा पीढ़ी को भी सनातन संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बनती दिख रही है।
साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया पर इस गीत को खूब सराहा जा रहा है और यह शिवभक्तों के बीच एक भक्ति-संवेदना की नई लहर लेकर आया है।
‘सुषमा के स्नेहिल सृजन’ की यह प्रस्तुति निश्चित रूप से भक्ति साहित्य में एक नई ऊँचाई को छूती है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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