चतुर्थी पर सुषमा के सृजन की गूंज, गणपति भक्ति से महका साहित्य जगत

गणेशोत्सव पर सुषमा का सृजन बना भक्तिभाव का संगम
रायपुर। गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी सृजनधारा से भक्ति रस में भीगा एक अद्भुत छंद-मनहरण “घनाक्षरी” प्रस्तुत किया है। “चतुर्थी का मेला” शीर्षक से रचित इस कविता में गणपति बप्पा की आराधना, चतुर्थी का उल्लास और भक्तिभाव को जीवंत किया गया है।
“सुषमा के स्नेहिल सृजन”
छंद-मनहरण घनाक्षरी
चतुर्थी का मेला
चतुर्थी का लगा मेला, चरणों में चूहा खेला,
गणपति-गणपति,
लड्डू खूब खायेंगे।बच्चे सभी खुश बड़े, उत्सव मनाने खड़े,
ढोलक मंजीरे संग,
झूम-झूम गायेंगे।फूलों की सुगंध प्यारी, भक्तगण बलिहारी,
प्रेम से लगाएँ भोग,
उल्लास मनायेंगे।प्रसाद से भरे पेट, चढ़ाने आयेगा सेठ,
आरती सजायें दीप,
सुमन चढ़ायेंगे। (१)पंडाल सजे हैं प्यारे, मिलकर भक्त सारे,
मोरया मंगलमूर्ति,
भजन सुनायेंगे।भालचंद्र सुखकर्ता, लम्बोदर दुखहर्ता,
श्रद्धा से झुकायें शीश,
शुभाशीष पायेंगे।गणराज गणदेवा, सेवा से ही मिले मेवा,
भाव से पूजन करें,
बप्पा दौड़े आयेंगे।‘सुषमा’ चंदन गंध, पंचामृत मकरंद,
फल मेवा चढ़ाकर,
तालियाँ बजायेंगे।_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल, रायपुर छ.ग.
कविता के हर छंद में उत्सव का उल्लास, आरती की ध्वनि, भजन की गूंज और भक्तों की श्रद्धा का अद्भुत चित्रण है। बच्चे हों या बड़े, ढोल-मंजीरे संग झूमते भक्त हों या चंदन-फूलों से सजी आरती—हर पंक्ति पाठकों को गणेशोत्सव की पावन अनुभूति कराती है।
साहित्य जगत और श्रद्धालुओं के बीच यह रचना तेजी से लोकप्रिय हो रही है। भक्तजन इस काव्य को “भक्ति और उत्सव का सुमधुर संगम” बता रहे हैं।
कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल का कहना है कि गणपति बप्पा का स्मरण जीवन में ऊर्जा और आनंद भर देता है। मेरा प्रयास है कि शब्दों के माध्यम से हर कोई इस भक्ति रस को अनुभव कर सके।
गणेशोत्सव की उमंग और भक्ति भाव को समर्पित यह सृजन निश्चित ही पाठकों और भक्तों के लिए प्रेरणा और आनंद का स्रोत बन रहा है।
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