कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने घनाक्षरी छंद में उकेरा ‘बाढ़’ का मार्मिक चित्र

रायपुर। छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी नई रचना “बाढ़” में प्रकृति के रौद्र रूप और मानवीय पीड़ा को शब्दों में ढाला है। छंद-मनहरण घनाक्षरी शैली में लिखी गई इस कविता में उन्होंने बाढ़ से उत्पन्न त्राहिमाम स्थिति, उजड़ते घर-द्वार, बहती फसलें और बेबस जीवन का मार्मिक चित्रण किया है।
सुषमा के स्नेहिल सृजन
छंद-मनहरण घनाक्षरी
“बाढ़”
प्रकृति का रौद्र रूप, विध्वंसक है स्वरूप,
अस्त व्यस्त जीव जंतु,
त्राहि-त्राहि डोलते।झोपड़ी हैं ढह गए, फसल भी बह गए,
बाढ़ की है विभीषिका,
ज्ञान-चक्षु खोलते।सरंक्षण मृदा कार्य,प्रथम है शिरोधार्य,
पेड़ कभी काटो मत,
हानि-लाभ तोलते।आए दिन समाचार, छाप रहे अखबार,
जलमग्न घर-द्वार,
सच बात बोलते।_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल
कविता में कवयित्री ने चेतावनी दी है कि यदि प्रकृति के संतुलन के साथ छेड़छाड़ हुई तो इसका परिणाम विध्वंसक होगा। उन्होंने मृदा संरक्षण और पेड़ बचाने का संदेश देते हुए समाज को पर्यावरण सुरक्षा की ओर प्रेरित किया है।
कवयित्री सुषमा प्रमे पटेल जी की यह रचना न केवल साहित्यिक दृष्टि से मनमोहक है, बल्कि समाज के लिए सार्थक संदेश भी देती है कि समय रहते हमें प्रकृति की शक्ति को समझना होगा।
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