छत्तीसगढ़साहित्य सृजन

“सुषमा के स्नेहिल सृजन” में झलकी दीपावली की उजास, कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की रचना “आओ द्वारे दीप सजायें” में संस्कृति, स्नेह और संस्कारों का सुंदर संगम

दीपों में झलकता स्नेह, शब्दों में बसी संस्कृति, जहाँ कविता बन गई उजाले की आरती

दीप जले घर-घर, सुषमा के शब्दों से मनहर, शब्दों की लौ से जगमगाई दीपावली

संस्कार, स्नेह और सरस्वती की साधना – सुषमा के सृजन में दीप सी आभा

रायपुर। दीपों के पर्व दीपावली पर कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी मधुर कविता “सुषमा के स्नेहिल सृजन” के माध्यम से हर घर, हर मन में उजाला फैलाने का संदेश दिया है।
कविता “आओ द्वारे दीप सजायें” में उन्होंने परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम रचा है, जहाँ दीपक की लौ केवल घर नहीं, बल्कि मन-मंदिर को भी आलोकित करती है।


”सुषमा के स्नेहिल सृजन”

आओ द्वारे दीप सजायें

मंगल कलश सजे घर-द्वारे।
झिलमिल दीपक लगते प्यारे।।
मन मंदिर में ज्योति जलायें।
हर प्राणी से प्रीति निभायें।।

सतरंगी रंगों में भाती।
शुभ रंगोली हृदय लुभाती।।
आओ द्वारे दीप सजायें।
अँधियारे को दूर भगायें।।

स्नेह-सुधा से स्वागत करती।
रात अमावस जगमग धरती।।
अंतस के सब द्वेष मिटायें।
माँ लक्ष्मी को आज रिझायें।।

मिट्टी का शुभ दीपक लाना।
तुलसी चौरा आप सजाना।।
बच्चों को संस्कार सिखायें।
दादा-दादी पाँव छुवायें।।

दीवाली का अर्थ बताना।
सही-सही मतलब समझाना।।
अच्छी बातें सदा बतायें।
नेक मार्ग चलना सिखलायें।।

सुंदर उत्सव मनें हमारा।
दीन-दुखी घर करें उजाला।।
धूप-दीप सह भोग चढ़ायें।
’सुषमा’ आरत मिल सब गायें।।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल


  • कविता की पंक्तियाँ –

मंगल कलश सजे घर-द्वारे, झिलमिल दीपक लगते प्यारे..
हर पाठक के हृदय में श्रद्धा और अपनापन भर देती हैं।

सुषमा प्रेम पटेल अपनी इस रचना के माध्यम से समाज में सकारात्मकता, पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कारों को संजोए रखने का आह्वान करती हैं।
वे बच्चों को संस्कार सिखाने, बड़ों के चरण स्पर्श की परंपरा निभाने और दीपावली के असली अर्थ को समझाने की प्रेरणा देती हैं।

कवयित्री ने अंत में भावपूर्ण संदेश दिया है – “सुंदर उत्सव मनें हमारा, दीन-दुखी घर करें उजाला..” जिससे समाज में साझा सुख, करुणा और मानवता की भावना को बल मिलता है।
“सुषमा के स्नेहिल सृजन” सचमुच अपने नाम की तरह ही, स्नेह और प्रकाश का संवेदनशील संदेश लेकर आया है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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