
ई-ट्राईसाइकिल ने बदली किस्मत, गागड़ा की संवेदनशीलता ने दिया नया जीवन
सोशल मीडिया पर दिखी बेबसी, माओवाद प्रभावित गांव तक पहुँची मानवीय मदद
बीजापुर। पहाड़ और जंगलों की खामोशी में घुटती ज़िंदगी जीने वाले मड़कम लखमा के चेहरे पर सोमवार को मुस्कान लौट आई है। जो रास्ता कभी उसके लिए सिर्फ संघर्ष था, आज उसी राह पर ई-ट्राईसाइकिल के पहिए उम्मीद और आत्मनिर्भरता की दिशा में घूम रहे हैं। यह बदलाव संभव हुआ पूर्व मंत्री महेश गागड़ा की मानवीय संवेदनशीलता से।
तेलंगाना के एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लखमा की तस्वीरें साझा की थीं – माओवाद प्रभावित पामेड़ क्षेत्र के कौर गट्टा गांव का एक दिव्यांग युवक, जो अपनी पूरी ज़िंदगी ज़मीन पर रेंगते हुए बिताने को मजबूर था। खबर देखते ही गागड़ा ने बिना देर किए मदद का निर्णय लिया और कठिन रास्तों को पार कर सीधे गांव पहुँच गए। वहीं, उन्होंने लखमा को ई–ट्राईसाइकिल भेंट की, जो उसके जीवन का सबसे बड़ा बदलाव बन गया।
अब ज़िंदगी नहीं रुकती… चल पड़ती है
कक्षा तीसरी में हुए एक हादसे ने लखमा की दुनिया ठहरा दी थी। पिता ने टूटी–फूटी साइकिल के चक्कों से उसे चलाने का प्रयास किया, पर परिस्थितियों की दीवारें बहुत ऊँची थीं। लेकिन आज, जब वह अपनी नई साइकिल पर निकला, तो उसका चेहरा उसी खुशी की कहानी कह रहा था जिसे शब्दों में कहा नहीं जा सकता।
लखमा ने कहा कि अब मैं अपने दम पर चल सकता हूँ… मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए।
यही है सेवा की असली राजनीति – महेश गागड़ा
लखमा को साइकिल सौंपते समय पूर्व मंत्री महेश गागड़ा ने कहा कि अगर एक छोटी पहल किसी की ज़िंदगी बदल सकती है, तो यही असली राजनीति है – सेवा की राजनीति।
बीजापुर जैसे क्षेत्र, जहाँ दूरी, अभाव और नक्सल प्रभाव अब भी मौजूद हैं, वहाँ यह पहल केवल एक ट्राईसाइकिल नहीं बल्कि लौटते विश्वास का प्रतीक बन गई है। यह कहानी साबित करती है कि इंसानियत की राह में कोई जगह दूर नहीं होती।
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