जल नहीं, तो जीवन नहीं : कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की रचना ‘जल – अनमोल’ ने दिया पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश

रायपुर। भीषण गर्मी के बीच जब प्रकृति प्यास से कराह रही है, तब रायपुर की सुप्रसिद्ध कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी नवीनतम रचना “जल – अनमोल” के माध्यम से समाज को पानी की अहमियत का भावुक और प्रेरणादायक संदेश दिया है।
”सुषमा के स्नेहिल सृजन”
जल_अनमोल
जल जीवन अनमोल है,
मानो अमृत समान।
व्यर्थ बहे मत जल धरा,
रखना है यह ध्यान।।पानी का बर्तन रखो,
दाना डालो आप।
धर्म-कर्म का काम है,
बढ़ा बहुत है ताप।।चिड़िया झाँके नीड़ से,
ग्रीष्म लगे सम आग।
दाना लाने को कहीं,
कैसे जाऊँ बाग।।गौरैया प्यासी कहे,
मुझे पिलाओ नीर।
नदी ताल सूखे पड़े,
कहाँ चलूँ तट तीर।।रुकती साँसें जल बिना,
बहे पसीना धार।
कैसे ‘सुषमा’ जग बचे,
पानी है आधार।_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल, रायपुर (छ.ग.)
कविता की हर पंक्ति एक चेतावनी बनकर गूंज रही है–
“जल जीवन अनमोल है, मानो अमृत समान।
व्यर्थ बहे मत जल धरा, रखना है यह ध्यान।”
सुषमा जी ने कविता के माध्यम से न सिर्फ जल संरक्षण का संदेश दिया, बल्कि पक्षियों के लिए दाना-पानी रखने की अपील भी की है। गर्मी की तपन में जब गौरैया की प्यास आवाज़ बनकर कहती है –
“गौरैया प्यासी कहे, मुझे पिलाओ नीर”,
तब ये कविता सिर्फ शब्द नहीं, संवेदना बन जाती है।
उन्होंने चिंता जताई कि सूखती नदियाँ, खाली होते तालाब और बेजुबानों की प्यास आने वाले संकट की घंटी हैं। कविता के अंतिम शब्दों में भाव स्पष्ट होता है:
“कैसे ‘सुषमा’ जग बचे, पानी है आधार।”
यह रचना लोगों को जागरूक कर रही है कि अगर हमने अभी भी जल की कीमत नहीं समझी, तो भविष्य संकटपूर्ण हो सकता है।
जल बचाओ – जीवन बचाओ
चिड़ियों के लिए पानी रखें, खुद के लिए पानी बचाएं।
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