रायपुरसाहित्य सृजन

कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल की कलम से झलका दिव्य अलौकिक प्रेम, “कृष्ण–रुक्मणी विवाह” पर रचना ने पाठकों को किया भाव-विह्वल 

रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्रख्यात कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल द्वारा रचित “सुषमा के स्नेहिल सृजन” शीर्षक श्रृंखला की नई कविता “कृष्ण-रुक्मणी विवाह” आज साहित्य जगत में चर्चाओं का केंद्र बनी हुई है। कोमल भावनाओं से भरी यह रचना पाठकों को रुक्मणी के हृदय की पीड़ा, कृष्ण के प्रति अनुराग और दिव्य मिलन की अलौकिक महिमा का एहसास कराती है।

”सुषमा के स्नेहिल सृजन”

कृष्ण रुक्मणी विवाह

रुक्मी जब करने लगा, चेदिराज से ब्याह।
भीतर-भीतर रो पड़ी, हिये रुक्मणी चाह।।

भेजी चिट्ठी प्रेम से, आओ प्रभु श्रीनाथ।
ले चलिए श्री साथ में, सदा झुकाऊँ माथ।।

राजकुमारी रुक्मणी, करती थी अनुराग।
कहे श्याम हर लीजिए, बनिए प्राण सुहाग।।

श्याम सुने जब प्रेम यह, विह्वल दोनों नेत्र।
धाए प्रभु श्री कृष्ण जी, विद्यापुर के क्षेत्र।।

मंदिर में थी रुक्मणी, करती हरि का ध्यान।
रथ ले दौड़े श्याम जी, रखा प्रेम का मान।।

चक्र लिए कर में चले, संग सखा बलराम।
विद्यापुर की भूमि पर, गूँजा प्रभु का नाम।।

चक्र-सुदर्शन साथ में, तन पीतांबर वस्त्र।
वक्ष विभूषित कृष्ण का, साथ सजे हैं शस्त्र।।

रथ पर बैठे श्याम तब, विद्यापुर के द्वार।
कहे रुक्मणी नैन से, श्याम करो उद्धार।।

’सुषमा’ सुंदर दृश्य है, शोभित प्रभु के वाम।
अति हर्षित है रुक्मणी, साथ खड़े हैं श्याम।।

_कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल

कवयित्री ने अपने शब्दों में उस क्षण को उकेरा है जब चेदिराज से विवाह की बाध्यता के बीच रुक्मणी भीतर ही भीतर टूट रही होती हैं। प्रेम-चिट्ठी के माध्यम से श्रीकृष्ण को पुकारती रुक्मणी और उसे सुनकर विद्यापुर की ओर दौड़ते श्रीकृष्ण का चित्रण अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण है।

कविता में सुदर्शन चक्र, पीतांबर-वस्त्र, बलराम संग रथ-यात्रा और रुक्मणी के मंदिर में ध्यानमग्न प्रतीक्षा जैसे दृश्य पाठकों को भक्ति और प्रेम के दिव्य संसार में ले जाते हैं। अंत में, श्याम के आगमन और रुक्मणी के हृदय के उल्लास को कवयित्री ने अत्यंत मार्मिक ढंग से पिरोया है।

सुषमा प्रेम पटेल की यह रचना न सिर्फ साहित्य प्रेमियों को आकर्षित कर रही है, बल्कि भक्ति-रस की अनुभूति भी करा रही है। उनकी लेखनी एक बार फिर साबित करती है कि परंपराओं, भावनाओं और आध्यात्मिकता को शब्दों में संजोने की उनकी क्षमता अद्वितीय है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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