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सादगी ने जीता दिल : धुड़मारास में ग्रामीणों के बीच बैठकर बड़ा-बोबो खाते दिखे कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप

बस्तर की मिट्टी, माताओं का प्यार और मंत्री की सादगी - धुड़मारास की तस्वीरें बनीं चर्चा का विषय

संवाद बना अपनत्व का सेतु, मातृशक्ति के चेहरे पर दिखी खुशी और आत्मविश्वास

प्रोटोकॉल से परे, लोगों के दिल से जुड़े – धुड़मारास में मंत्री केदार कश्यप का भावुक कर देने वाला अंदाज़

जमीन से जुड़े जननेता का आत्मीय अंदाज़, धुड़मारास में ग्रामीणों संग बैठकर चखा स्थानीय व्यंजन

जगदलपुर। सरल स्वभाव और जमीन से जुड़े जननेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप एक बार फिर आम लोगों के बीच अपनी सहजता और आत्मीयता के कारण चर्चा में रहे। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के धुड़मारास पहुंचकर उन्होंने स्थानीय माताओं द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक व्यंजन दार बड़ा और बोबो खरीदकर बड़े ही सादगीपूर्ण अंदाज़ में स्वाद लिया।

धुड़मारास प्रवास के दौरान मंत्री केदार कश्यप ने स्थानीय महिलाओं से आत्मीय संवाद कर उनका हालचाल जाना और पारंपरिक व्यंजनों की सराहना की। उन्होंने माताओं-बहनों की मेहनत, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की भावना को बस्तर की असली पहचान बताते हुए उनका उत्साह बढ़ाया। मंत्री का सहज और सम्मानपूर्ण व्यवहार देखकर महिलाएँ भी भावुक नजर आईं, जहां बातचीत सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि अपनेपन और विश्वास से भरी दिखाई दी।

मंत्री कश्यप ने कहा कि बस्तर की संस्कृति और यहां के लोगों का अपनापन हमेशा दिल को छू जाता है। उन्होंने बताया कि स्थानीय माताओं-बहनों के हाथों से बने व्यंजनों में केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि मेहनत और प्रेम की खुशबू भी होती है। ग्रामीणों के बीच बिना किसी औपचारिकता के बैठकर भोजन करना उनकी सहज और जमीन से जुड़ी कार्यशैली को दर्शाता है।

इस दौरान उपस्थित ग्रामीणों और पर्यटकों ने भी मंत्री के सरल व्यवहार की सराहना की। लोगों ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि का इस तरह आम नागरिकों के बीच घुल-मिल जाना उन्हें अपनेपन का एहसास कराता है। मंत्री कश्यप ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और महिलाओं के स्वावलंबन की भी प्रशंसा करते हुए कहा कि बस्तर की पारंपरिक पहचान को आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

धुड़मारास की वादियों में मंत्री का यह सहज और आत्मीय अंदाज़ लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा, जहां राजनीति से ऊपर उठकर उन्होंने एक आम नागरिक की तरह स्थानीय संस्कृति को सम्मान दिया और यही सादगी उन्हें जनता के और करीब लाती है।

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दिनेश के.जी. (संपादक)

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